कोरोना काल में इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए लोगों ने गिलोए का पानी और काढ़े का सेवन खूब किया है। लेकिन बीते दिनों एक रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें सितंबर से दिसंबर के बीच गिलोए के सेवन से होने वाले लिवर डैमेज के करीब 6 मामले सामने आए थे। हालांकि अब आयुष मंत्रालय ने इसपर कहा है कि गिलोए को लिवर डैमेज से जोड़ना पूरी तरह से भ्रम पैदा करने वाला है।
आयुष मंत्रालय ने कहा कि आयुर्वेद में इस जड़ी-बूटी का लंबे वक्त से इस्तेमाल हो रहा है। ‘क्लिनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल हेपाटोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन पर आधारित मीडिया की खबर का खंडन करते हुए, मंत्रालय ने कहा कि इस खबर में दूसरे अध्ययनों पर गौर नहीं किया गया, जो इस जड़ी-बूटी की प्रभावकारिता के बारे में बताते हैं। यह लिवर के अध्ययन के लिए इंडियन नेशनल एसोसिएशन (आईएनएएसएल) की सहकर्मियों द्वारा समीक्षा की गई पत्रिका है। मंत्रालय द्वारा जारी प्रेस रिलीज में आगे लिखा है कि रिसर्च में इस बात का जिक्र है कि जड़ी-बूटी टिनोस्पोरा कोर्डिफोलिया (टीसी), जिसे आम तौर पर गिलोय या गुडुची के नाम से जाना जाता है, उसके उपयोग से मुंबई में छह मरीजों के लिवर ने काम करना बंद कर दिया। मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि उसे लगता है कि रिसर्च के लेखक मामलों के सभी आवश्यक विवरणों को व्यवस्थित प्रारूप में रखने में विफल रहे।
इसने कहा, ‘इसके अलावा, गिलोय या टीसी को लिवर को नुकसान पहुंचाने वाला बताना भारत की परंपरागत चिकित्सा प्रणाली के लिए भ्रामक एवं विनाशकारी है क्योंकि जड़ी-बूटी गिलोय या गुडुची का आयुर्वेद में लंबे समय से प्रयोग किया जा रहा है। विभिन्न विकृतियों को ठीक करने में टीसी की प्रभावकारिता जांची-परखी है।’
बयान में कहा गया, ‘अध्ययन के विश्लेषण के बाद, यह भी पाया गया कि अध्ययन के लेखकों ने जड़ी-बूटी की सामग्रियों का अध्ययन नहीं किया जिसका सेवन मरीज कर रहे थे। यह लेखकों की जिम्मेदारी है कि वे सुनिश्चित करें कि मरीज टीसी का ही सेवन कर रहे थे किसी दूसरी जड़ी-बूटी का नहीं।’
इसने कहा कि इस बारे में ठीक समझ बनाने के लिए लेखकों को किसी वनस्पति वैज्ञानिक या आयुर्वेद के विशेषज्ञ की राय लेनी चाहिए थी।
मंत्रालय ने कहा कि दरअसल कई अध्ययनों में पाया गया है कि जड़ी-बूटी की सही पहचान न करने से गलत परिणाम आ सकते हैं। इसने कहा कि टीसी जैसी दिखने वाली दूसरी जड़ी-बूटी का लिवर पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
मंत्रालय ने कहा, ‘इसके अलावा भी अध्ययन में काफी खामियां थी। इसने रोगियों को कितनी खुराक दी गई या उन्होंने इसके साथ कोई और दवा भी ली थी इसकी जानकारी नहीं दी। अध्ययन में मरीजों के पूर्व या मौजूदा चिकित्सीय रिकॉर्ड पर भी गौर नहीं किया गया।’
यहां यह बताना भी आवश्यक है कि टीसी या गिलोय को लिवर, नसों के लिए सुरक्षित बताने वाले कई वैज्ञानिक प्रमाण हैं। गिलोय आयुर्वेद में दी जाने वाली सबसे आम दवा है। किसी भी क्लिनिकल अध्ययन में इसके प्रतिकूल प्रभाव नहीं देखे गए हैं।







